एक रिपोर्ट के अनुसार चीन में पॉल्यूशन को कम करने के लिए डीजल और Petrol से चलने वाली कारों को बैन करने की योजना पर सरकार काम कर रही है। इसके अलावा डीजल और पेट्रोल कारों के उत्पादन पर भी प्रतिबंध लगाने का विचार किया जा रहा है। इसी तरह चीन से पहले प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के तहत ब्रिटेन और फ़्रांस पहले ही डीजल और पेट्रोल से चलने वाली कारों को बंद करने का ऐलान कर चुके हैं। देखा जाए तो यह सरकारों का बिल्कुल तानाशाही रवैया है, सोचिए जिन गरीब-गुरबों ने अपनी मेहनत की कमाई से पाई-पाई जोड़कर इन कारों को खरीदा था उनका क्या होगा.. यह एकतरफा फैसला है।

कम्युनिस्ट सरकारों का हमेशा से यह एजेंडा रहा है कि अपनी विचारधारा जनता पर थोपकर धीरे-धीरे तानाशाह हो जाते हैं। चीन विश्व में कारों का सबसे बड़ा बाजार है, उसके बाद भी यह बेवकूफी भरा फैसला बताता है कि चीन के लाल कच्छे वाले हुक्मरानों को अर्थशास्त्र की बिल्कुल भी समझ नहीं है।

अब बात करते हैं भारत की, हाल ही में परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने Petrol और डीजल से चलने वालो वाहनों पर प्रतिबन्ध लगाने के बारे में कहा था – “हमें वैकल्पिक ईंधन का रुख करना चाहिए। मैं ये करने जा रहा हूं, आप इसे पसंद करें चाहे न करें मैं आपसे पूछूंगा नहीं। मैं इसे उखाड़ फेकूंगा। प्रदूषण के लिए, आयात के लिए मेरे विचार बहुत साफ हैं।”

जैसे ही शाह जी को परिवहन मंत्री के इस बयान के बारे में पता चला उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और इस मुद्दे पर दिग्गज नेताओं की बैठक बुला ली। बैठक में उन्होंने सुरसा एजेंसियों से मिले इनपुट के हवाले से कहा कि जब देश भर का मीडिया गौरी लंकेश, गुजरात में पगला गए विकास, गोरखपुर में मरे बच्चों से लेकर BHU में छात्राओं पर लाठीचार्ज जैसी घटनाओं को हवा देकर सरकार को ‘झूठा’ बदनाम करने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में मंत्री का ये बेबाक बयान जनता को सरकार के खिलाफ कर सकता है।

जेटली जी ने भी कड़ी नाराजगी दिखाते हुए कहा कि यदि कार-उद्योग बंद होते हैं तो राजस्व का भारी नुकसान होगा और Demonetisation से अर्थव्यवस्था के विकास को जो गति मिली है वो भी प्रभावित होगी। इतना ही नहीं.. एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने यह भी कह डाला कि यह इलेक्ट्रिक कार निर्माताओं की साजिश है, परदे के पीछे कोई तगड़े वाली लॉबिंग हुई है।

माहौल गर्म होते देख शाह जी ने चुटकी लेते हुए कहा कि गडकरी जी की कमर का साइज़ देखकर मुझे नहीं लगता कि ये किसी भी परदे के पीछे छुप सकते हैं। शाह जी की चुटकी पर लगे ठहाकों के बाद एक बार फिर से कमरे में सन्नाटा पसर गया। अब पेंच अर्थशास्त्र और पर्यावरण-प्रेम के बीच फंस गया था।

कहते हैं कि जब भी भक्तों के लिए कोई विपत्ति की स्थिति आती है, भगवान को जाहिर होना ही पड़ता है। कुछ इसी तरह जब सरकार किसी दुविधा में फंसी नजर आती है तो प्रधानसेवक को संकटमोचक बन कर सामने आना पड़ता है। आखिर में सबकी बात को गौर से सुनने के बाद परिधानमंत्री जी ने अपनी चुप्पी तोड़ी।

पर्यावरण और इकोनोमिक्स के इस फ्रेंडली मैच को 1-1 पर निपटाते हुए उन्होंने कहा कि हमारी सरकार जनता के प्रति संवेदनशील है, चीन की तरह हमारी सरकार जज्बाती होकर फैसला नहीं लेगी बल्कि जनता को साथ लेकर चलेगी। उन्होंने सुझाया कि कल से पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए जाएंगे। इससे राजस्व का इजाफा होगा और जनता को कार महंगी लगने लगेगी। एक बार फिर से दूरदर्शिता का परिचय देते हुए सरकार ने तय किया कि अर्थशास्त्र और पर्यावरण दोनों में बैलेंस रखते हुए पेट्रोल के दाम ही इतने बढ़ा दिए जाएँ कि जनता खुद कार-लैस होने के बारे में सोचे और देश की तरक्की में योगदान दे।

और इस तरह देश ने एक बार फिर से चीन को हरा दिया… बस कुछ दिनों की तकलीफ है मोदी जी ने कुछ किया है तो सोच-समझकर ही किया होगा।

अर्थशास्त्र की गहरी समझ रखने वाले और पर्यावरण के प्रति सजग लोग ही इस पोस्ट पर कमेन्ट करें.. वरना पाप लगेगा.. समझ आए तो शेयर करें, एक मित्र ने 10 दोस्तों के साथ शेयर किया उसका सिलेक्शन मार्गदर्शक मंडल में हो गया..

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