कुछ यादें.. मेरे स्कूल के बस्ते से

ये पात्र काल्पनिक हो सकते हैं पर ये घटनाएं रोज होती हैं हमारे स्कूलों में..

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Happy Teachers’ Day! आज Facebook, Twitter आदि पर गुरुजनों के प्रति खूब सम्मान उमड़ रहा होगा। ठीक वैसा जैसा कि Mother’s Day, Father’s Day और Valentines Day पर होता है। होना भी चाहिए.. क्यूंकि आज अगर हम कुछ हैं तो अपने गुरुजनों की वजह से हैं। जिन्होंने हमें पढना-लिखना सिखाया आज के दिन उनका वंदन करना तो बनता ही है। पर देश के जिस हिस्से (हरियाणा) में मैं पला-बढ़ा हूँ वहां की मिट्टी में ही कुछ ऐसी बात है कि इसे तार्किकता कहें या Cynicism हर सिक्के का दूसरा पहलू देखने की आदत सी हो गई है।

सच कहूं तो रोजमर्रा की जिंदगी हमारे सामने इतने सवाल खड़े कर देती है कि उनके उत्तर तलाशने की उधेड़बुन में कहीं न कहीं समाज और सिस्टम के कड़वे सच से सामना हो ही जाता है। मोदी जी हर महीने मन की बात करते हैं, तो मैंने सोचा क्यूँ न मैं भी आज शिक्षक दिवस के अवसर पर अपने मन की बात कह ही दूं।

उद्देश्य किसी को आहत करना नहीं है, बस एक छोटा सा प्रयास है यह सवाल पूछने का कि क्या पढाई-लिखाई का मकसद सिर्फ डॉक्टर, इंजिनियर, CA या सरकारी नौकरी वाला बाबू बनाना है?

कुछ यादें.. मेरे स्कूल के बस्ते से

कल बाजार से लौट रहा था, रास्ते में रविन्द्र मिला.. अपनी बिटिया के साथ हॉकी खेलकर लौट रहा था। मुझे याद है जब हम स्कूल में पढ़ते थे, रविन्द्र मोहल्ले का सबसे बेहतरीन खिलाड़ी था। हमारे मोहल्ले की बच्चापार्टी का कैप्टन हुआ करता था, लम्बी-लम्बी फेंका करता था। कहता था.. देश के लिए ओलम्पिक खेलूंगा।

एक बार खेलते वक्त उसके हाथ पर चोट लगी तो स्कूल का होमवर्क नहीं कर पाया। अगले दिन मास्टर जी ने मोहल्ले के ‘ध्यानचंद’ को स्कूल में मुर्गा बनाया, और उसके पिताजी को शिकायत भी लगा दी। घर पहुंचा तो अंकल ने उसी हॉकी से रविन्द्र को गली में दौड़ा-दौड़ा के खूब पेला। याद है.. मैं, राहुल, जीतपाल और ममता खूब हंसे थे रविन्द्र की इस पिटाई पे। हमारे साथ-साथ मोहल्ले वालों ने भी खूब लुत्फ़ उठाया था इस ‘तमाशे’ का।

रविन्द्र ने कभी हॉकी ना खेलने की कसम खा ली थी। पढ़ाई में भी होशियार था रविन्द्र… जैसा कि उन दिनों रिवाज था, दसवीं के बाद रविन्द्र ने पॉलिटेक्निक कॉलेज में इलेक्ट्रिकल इंजीन्यरिंग का डिप्लोमा कर लिया। आज रविन्द्र बिजली बोर्ड में जे.ई. है। अच्छी-खासी सैलरी है, ऊपर की कमाई भी हो जाती है।

अब रविन्द्र ने कसम तोड़ दी है। रोज हॉकी खेलता है.. अपनी बिटिया के साथ। उसकी आँखों में ओलम्पिक खेलने का सपना आज भी तड़पता नजर आता है।

रविन्द्र से मिलकर घर पहुंचा तो चाय पीते-पीते बचपन की यादें शाम के धुंधलके में घुलने लगी। सन्नी मेरा अच्छा दोस्त था। रोज नई-नई कहानियाँ सुनाया करता था। सन्नी की कहानियों में हम इस कदर खो जाते थे कि कभी नागराज की कॉमिक्स खरीदने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई।Bachpan Ki Yaadein, Happy Teachers' Day , teachers day essay in hindi, education quality in india, education in haryana, happy teachers day greeting slogan, शिक्षक दिवस पर निबंध , Teachers day 2016 wallpaper, teacher day funny idea एक बार उसने जिला-स्तरीय निबन्ध प्रतियोगता में स्कूल को पहला स्थान दिलवाया था। इतनी छोटी-सी उम्र में भी सन्नी गजब का कहानीकार था। हमारे लिए तो वही ‘मुंशी प्रेमचन्द’ और वही ‘परसाई’ था। जबरदस्त लेखनी और हैरतअंगेज कल्पना। एक दिन मास्टर जी ने हमारे बस्ते चैक किए और मास्टर जी के हाथ वो कॉपी लग गई, जिसमें सन्नी अपनी कहानियाँ लिखा करता था। मास्टर जी ने सन्नी को मारा तो नहीं, पर वो कॉपी फाड़ दी जिसमें उसका ‘कलेक्शन’ था। खूब रोया था सन्नी उस दिन।

सन्नी ने लिखना छोड़ दिया था.. शायद पढ़ना भी… दसवीं तक सन्नी बस 40% नम्बर लेके ही पास हुआ। आज भी सन्नी की कहानियाँ छपती हैं। सन्नी नहीं लिखता, अख़बार वाले लिखते हैं… उसके दो नम्बर के धंधों की कहानियाँ। शहर का सबसे बड़ा सट्टेबाज है सन्नी। हर IPL सीजन में उसका नाम अख़बार में जरूर छपता है।

एक कोमल भी थी। हिमाचल से यहाँ हरियाणा में शिफ्ट हुआ था उसका परिवार। बहुत सिम्पल और मृदुभाषी लड़की थी। जितनी विनम्रता उसके शब्दों में थी उतनी ही मिठास उसकी आवाज में थी। कहती थी बड़ी होके ‘लता मंगेशकर’ बनूँगी। हमें हिमाचली लोकगीत कहाँ समझ आते थे, पर फिर भी हाफ-टाईम में हम सब उसे घेर लेते थे और जिद् करते थे कुछ गा कर सुनाने की।

प्यार से हम उसे छुटकी बुलाते थे उन दिनों लड़के-लड़कियां स्कूल में, गली-मोहल्ले में खूब स्नेह रखा करते थे आपस में.. भाई-बहन के जैसा। बॉलीवुड की ‘गन्दगी’ से हमारे बालमन कोसों दूर थे। एक दिन कोमल हमें एक गीत सुना रही थी…

“शिमले नि वस्सना, कसौली नि वस्सना..
चम्बे.. जाना जरूर…”

हम सुनने में और छुटकी गाने में मस्त थी, हमें पता ही नहीं चला कब मास्टर जी वहाँ आके खड़े हो गए और गौर से सुनने लगे। गाना खत्म हुआ और हमारी तालियों के शोर में मास्टर जी की रौबदार आवाज गूंजी। खूब मखौल उड़ाया मास्टर जी ने छुटकी के हुनर का।

फिर कभी हमने छुटकी को गाते हुए नहीं सुना.. हमने भी कभी उसे गाने के लिए नहीं कहा, हमें भी तो डर लगता था मास्टर जी से। मास्टरजी का नाम हमने ‘भालू’ रख दिया था। मैं, रविन्द्र और राहुल लास्ट बैंच पर बैठते थे। जैसे ही मास्टर जी क्लास के आसपास होते, हम खिड़की से देखकर अपने-अपने बैग झाड़ने लगते, सारी क्लास को सिग्नल दे देते कि भालू जी आ रहे हैं, ताकि कोई और मासूम उपहास का पात्र ना बन जाए।

दसवीं के बाद छुटकी से कभी नहीं मिला। शादी हो गयी होगी उसकी, अब तक तो चार-पांच बच्चों की माँ होगी। कभी सुनिधि चौहान को टीवी पर गाते देखता हूँ तो सोचता हूँ.. हमारी छुटकी होती तो सबकी छुट्टी कर देती।

ये पात्र काल्पनिक हो सकते हैं पर ये घटनाएं रोज होती हैं हमारे स्कूलों में.. कई बार लिखना चाहा ये पर कभी जज्बातों ने साथ नहीं दिया, जल्दी बह जाते थे। सोचा टीचर्स डे से बेहतर मौका और क्या होगा Mann Ki Baat कहने का.. सो लिख दिया, क्योंकि मेरे आसपास बहुत से अध्यापक हैं।

मकसद किसी को शर्मिंदा करने का नहीं है, बस विनम्र प्रार्थना है अध्यापकों से और Parents से.. बच्चों को पढ़ाएं-लिखाएं, डॉक्टर इंजीनयर CA बनाइए, पर साइंस-मैथ के सवालों के बीच किसी सचिन तेंदुलकर, लता मंगेशकर या मुंशी प्रेमचंद का कत्ल ना करें।

खैर.. हैप्पी टीचर्स डे..

-आपका अवज्ञाकारी शिष्य
सुमित

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