नोटबंदी पर अपने ही जाल में घिरता नजर आ रहा है विपक्ष

बदलते समय के अनुसार राष्ट्रहित में यदि कोई कड़ा फैसला लिया जाए तो उस मुश्किल घड़ी में सरकार की न सही 'आम हिन्दुस्तानी' की मदद कर देना ही असली राष्ट्रधर्म है

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सरकार द्वारा नोटबंदी का फैसला लिए महीना भर बीतने को है, परन्तु विपक्ष का स्टैंड अभी भी समझ से परे है। जहाँ एक तरफ बीजेपी नोटबंदी को मोदी सरकार का जनहित में उठाया ‘साहसिक’ कदम बताकर चुनावी माहौल कैश करने की कोशिश कर रही है वहीं विपक्ष खुद ही दिग्भ्रमित नजर आ रहा है। आम आदमी को जो परेशानी हो रही है उससे विपक्ष कहीं भी जुड़ता नहीं दिख रहा। शुरुआत में ही विपक्ष की तरफ से आम आदमी की परेशानी की दुहाई देकर नोटबंदी पर सरकार को घेरने की कोशिश हुई। परन्तु जैसे जैसे दिन बीते विपक्ष हमलावर होने के प्रयास में अम्बानी-अडानी, RBI की पालिसी और चहेतों को लाभ पहुँचाने के आरोपों तक सीमित हो गया। बैंक की कतारों में खड़े होकर राशन का खर्चा, बिजली का बिल, बच्चे की फीस, सब्जी वाले का बकाया, दवा-दारू के बजट की कश्मकश में उलझे आम आदमी को शायद ही किसी अम्बानी-अडानी या आरबीआई के बारे में सोचने की फुर्सत हो। विपक्ष चाहता तो इसे अच्छे से कैश कर सकता था, पर विपक्ष के ‘राजनीतिक एजेंडे’ को देखकर आम आदमी को यही लगा कि विपक्ष को उसके दर्द की फ़िक्र नहीं बल्कि अपने ब्लैक-व्हाइट की पड़ी है। opposition protest on demonetization, नोटबंदी

नोटबंदी पर अपने ही जाल में घिरता नजर आ रहा है विपक्ष

नोटबंदी के फैसले के बाद जो प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हुआ उसने कई करवटे बदली। शुरू में बड़े नेताओं ने सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए सरकार का अच्छा कदम बताया और आम आदमी का ख़ास ख्याल रखने की हिदायत दी। जैसे ही विपक्ष ने देखा कि लोग असहज हो रहे हैं तो केजरीवाल, गुलाम नबी आजाद और राहुल गाँधी जैसे बड़े नेताओं ने जनता के साथ खड़े होने के बजाय आग में घी डालने की राजनीति शुरू कर दी। ऐसा नहीं कि नोटबंदी की मार बीजेपी समर्थकों पर नहीं पड़ी होगी, पर दाद देनी पड़ेगी उनके आत्मविश्वास की जो अपने दर्द छुपाकर सरकार के साथ मुस्कुराते नजर आए। जनता के गुस्से को समझते हुए बीजेपी ने जहाँ अपने कैडर को बैंकों में जाकर स्थिति को सम्भालने और लोगों की मदद करने के लिए निर्देश दिए, वहीं बाकी दलों के कार्यकर्त्ता लाइन में लगकर बैंक अधिकारियों को गरियाते, सरकार को कोसते और अव्यवस्था फैलाते नजर आए। इस पूरे मामले में एक बात जो ख़ास रही वो यह कि सरकार ने जनता और विपक्ष को जो सरप्राइज दिया उस पर प्रतिक्रिया कैसे दी जाए, दोनों ही नहीं समझ पाए। यहाँ दो उदाहरण देना चाहूँगा-

  • नोटबंदी के मामले में पत्रकारों से बात करते हुए राहुल गाँधी ने ब्यान दिया कि सरकार ने अपने ख़ास लोगों को पहले से ही नोटबंदी के बारे में बता दिया था। सही डेढ़ मिनट बाद उन्होंने उसी कैमरे पर यह ब्यान दिया की सरकार भरोसे के लायक नहीं है, प्रधानमंत्री ने इस बड़े फैसले के बारे में वित्तमंत्री अरुण जेटली को भी नहीं बताया।
    meme kehna kya chahte ho, opposition protest on demonetization, नोटबंदी राहुल गाँधी के इस ब्यान में जितना विरोधाभास है उतना ही हास्य भी है, और यह हास्य परिस्थितिजन्य नहीं एकदम नेचुरल है..
  • अभिषेक मिश्रा नाम के एक स्वयंभू सर्वकला सम्पन्न स्पेशलिस्ट हैं जो YouTube पर लगभग हर मामले पर अपने in-एक्सपर्ट ओपिनियन देते हैं। इन्होने एक ऐसे व्यक्ति की फोटो Tweet कर दी जो बैंक में चोरी पकड़े जाने के डर से फांसी लटक गया था, लाश पर राजनीति करने में एक्सपर्ट अरविन्द केजरीवाल जी तो जैसे ऐसी ही किसी खबर के इंतजार में थे कि कब कोई मरे और कब सरकार को घेरा जाए। चोरी की फोटो को नोटबंदी से जोड़कर उन्होंने Tweet कर तो दिया, पर जैसे ही फोटो का सच सामने आया तो वापिस paytm और बिग बाजार पर लौट आए।
    arvind kejriwal abhishek mishra tweet, kejriwal lie tweet fake, opposition protest on demonetization, नोटबंदी Tweet देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि मोदी जी को ‘कौन से ‘गरीब की हाय लगी है 😉

अब बात करते हैं आम आदमी की – आम आदमी को परेशानी जरुर हुई है, सरकार की तरफ से तकलीफ कम करने कोशिश भी की गई पर हर स्तर पर नाकामी नजर आई। सरकार की तरफ से मोबाईल एटीएम, कैशलेस ट्रांजेक्शन, किसानों और शादी वाले परिवारों को छूट देने, पैट्रॉल पम्प और हस्पतालों को गाइडलाइन जारी करने से कुछ राहत जरूर मिली, एटीएम के बाहर लगी कतारों में भी कमी आई पर जनता के बीच जो भ्रम की स्थिति थी उसे दूर करने में सरकार नाकाम रही। असली समस्या जानकारी के अभाव की थी कि आम आदमी को यह नहीं समझ आ रहा था कि सरकार क्या कर रही है, क्यों कर रही है और इस पूरे प्रोसेस में उसे कैसे अपना चूल्हा-चौका चलाना है। मीडिया और विपक्ष की तरफ से नकारात्मक ख़बरें दिखा-दिखाकर आम आदमी में जो भय और भ्रम की स्थिति पैदा की गई उसे सरकार सम्भालने में असफल रही। इसमें यह तो नहीं कहा जा सकता कि सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव था पर तंत्र की नाकामी जरुर कही जा सकती है। उदहारण के लिए बैंक कर्मचारियों से लेकर सरकारी हस्पतालों तक सभी का रवैया सहयोगात्मक रहा परन्तु जिस स्तर की कोशिश पूरे देश में प्रभावी तौर पर की जानी चाहिए थी उसके लिए शायद सरकारी तंत्र तैयार नहीं था। विपक्ष इस कमजोरी का फायदा उठाने के चक्कर में मूल मुद्दे से भटक गया और अपनी फजीहत करवा बैठा। ऐसा मैं नहीं आंकड़े कह रहे हैं – विभिन्न एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वे में देश की जनता ने सरकार के इस फैसले को सराहा है। इन सर्वेक्षणों को अगर एक तरफ रख भी दें तो उपचुनावों में जिस तरह बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल की है वो एक तरह से नोटबंदी के समर्थन में मिला जनादेश ही तो है। त्रिपुरा जैसे वामपंथी झुकाव वाले बीजेपी का मत प्रतिशत 43 फीसदी बढ़ना और कांग्रेस का 41 फीसदी कम होना इस जनादेश की गवाही ही तो है। नोटबंदी का असर क्या होगा, भ्रष्टाचार में कमी आएगी या नहीं, ब्लैक मनी पर कितना असर होगा यह तो वक्त बताएगा पर आम आदमी पर जो इसका असर पड़ा और तकलीफ हुई वो अभी वर्तमान परिदृश्य में नजर आने वाली चीज थी। विपक्ष के लिए ये अच्छा मौका था जनता के साथ खड़े होने का पर मुद्दों से भटककर और अपने बेतुके बयानों से विपक्ष आम आदमी की नजर में खुद को खलनायक बना बैठा।

सरकार के साथ खड़ा दिखा आम आदमी

manuj jain facebook about notbandi

नोटबंदी के इस पूरे एपिसोड में हर स्तर पर स्ववेदना से ऊपर उठते हुए संवेदना का संचार होते दिखा। बैंक कर्मचारियों ने जहाँ अपना फर्ज पूरे अनुशासन के साथ निभाया वहीं वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगो के मामले में संवेदनशीलता नजर आई। देश भर से ऐसी कई ख़बरें आई जहाँ मोहल्ले वालों ने मिलकर किसी शादी वाले परिवार का सहयोग किया।  शुरू के एक-दो दिन दुकानदारों ने पुरानी करंसी के बारे में स्पष्टता न होने के कारण ग्राहकों को जरूर लौटाया पर वक्त की जरूरत को समझते हुए स्वाइप मशीनों और ई-पेमेंट के विकल्पों को अपनाकर सूझ-बूझ कर परिचय दिया। चूँकि हर कोई तकनीक से वाकिफ नहीं तो मनुज जैन जैसे कुछ भले इंसानों ने अपने-अपने स्तर पर इसका व्यवहारिक हल निकालने के प्रयास भी किए। मनुज कैशलेस इकोनोमी को अवश्यम्भावी बताते हुए सुझाते हैं – “नकदी के न्यूनतम प्रयोग वाली अर्थव्यवस्था ही भारत का भविष्य है, यह आपके रोके नहीं रुकने वाली.. यह प्रगति का चक्का इतना तेज़ घूमेगा कि आप साथ न चले तो कुचल कर आगे बढ़ जाएगा.. इसलिए समाधान की तरफ़ बढ़िए, समस्या तो हर कोई गिनवा सकता है…” राष्ट्रवाद की नित नई परिभाषा गढ़ने वालों को भी इससे सीख लेनी चाहिए, पाकिस्तानी कलाकारों से हफ्ता-वसूली कर लेना और भारत माता की जय के नारे लगा देना ही देशभक्ति नहीं है, बदलते समय के अनुसार राष्ट्रहित में यदि कोई कड़ा फैसला लिया जाए तो उस मुश्किल घड़ी में सरकार की न सही ‘आम हिन्दुस्तानी’ की मदद कर देना ही असली राष्ट्रधर्म है।

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