मांसाहार : अभी नहीं संभले तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम

धर्म, समाज, संस्कृति और मान्यताओं से इतर मांसाहार से जुड़ा एक ऐसा वैज्ञानिक पहलू भी है जिसे समझा जाना जरुरी है। यकीन मानिए, राजनीति करने के बजाय अगर इस वैज्ञानिक विश्लेष्ण को गंभीरता से समझा जाए तो देश की अधिकतर आबादी, तमाम बुद्धिजीवी और समाज से सरोकार रखने वाले तमाम लोग मांसाहार पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के पक्ष में खड़े नजर आएँगे।

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महाराष्ट्र व हरियाणा में बीफ बैन होना, पर्युषण पर्व के दौरान मीट बैन का विरोध होना और फिर बिहार चुनाव से ठीक पहले अचानक ‘बीफ’ राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाना, यदि इन सभी कड़ियों को जोड़ कर देखा जाए तो सीधे तौर पर यह आस्था का मुद्दा कम और राजनीतिक मसला ज्यादा नजर आता है।

उदहारणत: पर्युषण पर्व के दौरान  मीट की बिक्री पर बैन होना कुछ नया नहीं था। महाराष्ट्र में ऐसा 1964 से होता आ रहा था और पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौर में भी यह  बैन यथावत जारी रहा। परन्तु अचानक 2015 में ऐसा क्या हुआ कि इसे ‘आजादी’ और ‘फ़ूड-च्वायस’ पर हमले के रूप में देखा जाने लगा? यदि प्रश्न आस्था का है, तो अन्य धर्मों की आस्था पर प्रहार क्यों? और प्रश्न यदि सहिष्णुता का है तो यह गौकशी तक ही सीमित क्यों?

इन सब सवालों का जवाब ढूँढने के लिए इस विषय को व्यवहारिकता के चश्मे से देखे जाने की जरुरत है। harms of non veg food go beyond we can imagine, vegetarianism essay in hindi.

बीफ बैन के मुद्दे पर पूरे देश में जो बहस छिड़ी है, वह तथाय्त्म्क तर्क-वितर्क से परे महज ‘सेलेक्टिव-आउटरेज‘ तक सीमित है। पिछले दिनों कई जाने-माने विद्वानों और फ़िल्मी-हस्तियों ने ट्विटर के माध्यम से बीफ बैन और मीट बैन पर कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज करवाई।

अगर इन हस्तियों के पुराने ब्यानों और  ट्वीटस को खंगाला जाए इनमें से अधिकतर लोग पशु-अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘पेटा’ के झंडाबरदार नजर आते हैं। अन्य पशु-पक्षियों के प्रति दया की अपील करने वालों का गौमांस को ‘फ़ूड-च्वायस’ बताते हुए बैन की आलोचना करना जितना हास्यास्पद है उतना ही चिंताजनक भी है।

इन उदाहरणों से जाहिर है कि यह बहस बेहद गंभीर मोड़ पर पहुँच चुकी है, जिसे अब भावनात्मक तथ्यों से ऊपर उठकर विश्लेष्णात्मक दृष्टिकोण से सुलझाया जाना जरुरी है।

मांसाहार के दुष्परिणाम – Harms of Non Vegeterian Food : Scinetific Facts

धर्म, समाज, संस्कृति और मान्यताओं से इतर मांसाहार से जुड़ा एक ऐसा वैज्ञानिक पहलू भी है जिसे समझा जाना जरुरी है। यकीन मानिए, राजनीति करने के बजाय अगर इस वैज्ञानिक विश्लेष्ण को गंभीरता से समझा जाए तो देश की अधिकतर आबादी, तमाम बुद्धिजीवी और समाज से सरोकार रखने वाले तमाम लोग मांसाहार पर प्रतिबन्ध लगाए जाने के पक्ष में खड़े नजर आएँगे।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में मीट का उत्पादन ग्रीन-हॉउस गैसों के उत्सर्जन की बड़ी वजह बन चुका है। पूरे विश्व में मीट-उत्पादन से होने वाला ग्रीन-हॉउस उत्सर्जन 6.5 बिलियन टन से भी ज्यादा है जोकि विश्वभर में होने वाले कुल उत्सर्जन (36.3 टन) का लगभग 18 प्रतिशत है।

अक्सर ओजोन परत पर मंडराते खतरे और ग्लोबल वार्मिंग के लिए अंधाधुंध औद्योगीकरण और यातायात के साधनों कार, मोटरसाईकल इत्यादि को जिम्मेवार माना जाता है, परन्तु इस रिपोर्ट के अनुसार उद्योगों और यातायात से होने वाला उत्सर्जन मांस-उत्पादन से कहीं कम लगभग 14.2 प्रतिशत है।

एक पल के लिए पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों को अगर नजरंदाज भी कर  दिया जाए तो वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाईजेशन की दूसरी रिपोर्ट इससे कहीं ज्यादा भयावह प्रतीत होती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक बर्ड-फ्लू, स्वाइन-फ्लू, सार्स, मैडकाऊ जैसे पशुजनित रोगों के अलावा मनुष्यों में पाई जाने वाली मौजूदा बीमारियों में से लगभग 72% बीमारियों के वायरस पशुओं समूहों से मनुष्यों में आए हैं।

इस रिपोर्ट के मुताबिक पशुओं की दुनिया में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप की वजह से हर वर्ष 2.2 मिलियन से भी ज्यादा लोग पशुजन्य रोगों की गिरफ्त में आकर अपनी जान गंवा देते हैं। हमारे पूर्वजों ने शायद यह खतरा बहुत पहले ही भांप लिया होगा। इसीलिए हमारे धर्मों और लगभग सभी पवित्र ग्रंथों में मनुष्य को प्रकृति के नियमों से छेड़छाड़ न करने की नसीहत दी गई है।

डेरा सच्चा सौदा के 3 बुनियादी नियमों में भी मांसाहार वर्जित है। बाबा राम रहीम सिंह के अनुसार मांसाहार बीमारियों की जड़ है और कई तामसिक प्रवृत्तियों को जन्म देता है। हाल ही में आई फिल्म एमएसजी-2 के एक दृश्य में गुरूजी ने बहुत ही प्रभावशाली और वैज्ञानिक ढंग से मांसाहार से होने वाले दुष्प्रभावों को समझाया है। यदि राजनीति से ऊपर उठते हुए धर्मों के वैज्ञानिक आधार को वक्त रहते समझ लिया जाए तो मानवता पर मंडराता एक बड़ा खतरा टल सकता है।

  • Beef ban is goodएक किलोग्राम गौमांस के उत्पादन से होने वाली ग्रीन-हॉउस गैसों का उत्सर्जन लगभग4 किलोग्राम कार्बन-डाई-आक्साइड के उत्सर्जन बराबर होता है।
  • एक किलो बोनलेस बीफ के उत्पादन के दौरान लगभग 15455 लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। एक हैमबर्गर बनने की पूरी प्रक्रिया में लगभग 660 गैलन पानी की बर्बादी होती है।
  • कार्बन-डाई-आक्साइड से 296-गुणा घातक मानी जाने वाली नाईट्रस आक्साइड के विश्व-भर में होने वाले कुल उत्सर्जन में गौमांस उत्पादन उद्योग की 65% हिस्सेदारी है।
  • जितना उत्सर्जन एक कार के लगभग 10 मील तक चलने में होता है उससे कहीं अधिक क्षति पर्यावरण को आधा पाउंड गौमांस के उत्पादन से हो जाती है।

(आंकड़े संयुक्त राष्ट्र, एमिशन-डाटाबेस फॉर ग्लोबल एटमोस्फियरिक रिसर्च और वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाईजेशन की रिपोर्ट में से लिए गए हैं)

Beef ban is good

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