अकेली सरकार के दम पर नहीं चल सकता बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान

हालांकि सरकार ने अपनी ओर से लड़कियों की शिक्षा को निशुल्क कर दिया है परंतु लड़कियों को घर से निकाल कर स्कूल तक लाने के लिए भी सरकार को ही आगे आना होगा। क्योंकि दशकों से जारी इस कोढ़ का खात्मा महज सरकारी योजनाएं बना देने नहीं हो सकता, समाज सरकार के साथ कदम मिलाकर चले तो कामयाब होगा Beti Bachao Beti Padhao अभियान

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जिस भारतवर्ष में कन्या को देवी मानकर पूजा जाता था , उस देश में आज अजन्मी कन्याओं को बेरहमी से मारा जा रहा है, कुत्तों के आगे फेंका जा रहा है।  वो ‘डाक्टर’ जिसे ‘फ़रिश्ते’ का दर्जा दिया जाता था , आज एक बेरहम कसाई बना हुआ है, वो ‘माँ’ जिसे ‘भगवान’ का दर्जा दिया जाता था, आज गर्भ में अपनी बेटी को मरवा रही है… वो ‘बाप’ जिसे ‘रक्षक’ कहा जाता था, जिसकी छत्रछाया में संतान स्वर्ग-सा अनुभव करती थी, वो आज भक्षक बना हुआ है।  कहाँ गयी वो अनख? धिक्कार है ऐसी मर्दानगी पर जो अपनी संतान की रक्षा नहीं कर सकती.. अकेली सरकार के दम पर नहीं चल सकता beti bachao beti padhao अभियान निबंध कन्या भ्रूण हत्या नारी सशक्तिकरण violence against woman in india female foeticide essay in hindi.female foeticide , beti bachao beti padhao , violence against woman

अकेली सरकार के दम पर नहीं चल सकता बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान

हरियाणा का एक दृश्य: रेवाड़ी जिले के एक छोटे से गाँव में पंचायत जमा है। डीसी और एसपी गाँव वालों से मंत्रणा कर रहे हैं । ग्रामीणों में रोष है और अधिकारी उन्हें समझाने का प्रयास कर रहे हैं। गांव सूमाखेड़ा व कतोपुरी की करीब 50 छात्राओं ने लड़कों की छेड़छाड़ और अश्लील हरकतों से परेशान होकर स्कूल जाना छोड़ दिया है। छात्राओं का कहना है कि लाल गांव के युवक छेड़छाड़ करते हैं और अश्लील इशारे करते हैं। उपायुक्त डॉ. यश गर्ग से मिलने पहुंचे छात्राओं के अभिभावकों ने कहा कि बेटियों को कैसे स्कूल भेजें, लड़के खुलेआम अश्लील हरकतें करते हैं। बेटियों से बात की तो उनका दर्द भी छलक उठा। जब भाजपा के पदाधिकारियों ने बेटियों से स्कूल न जाने का कारण पूछा तो वे फफक-फफक कर रो पड़ी। इन छात्राओं में 2 स्टेट लेवल की कबड्डी खिलाड़ी भी शामिल हैं। अब पंचायत ने कहा है कि इन छात्राओं को गांव के पढ़े-लिखे युवा ही पढ़ाएंगे। सरकार की तरफ से बच्चियों को पुलिस सुरक्षा में स्कूल भेजने की पेशकश की गई है और गाँव सूमा के स्कूल को अपग्रेड करने की बात भी कही जा रही है । पर इस सबके बाद भी लड़कियां पढना नहीं चाहती हैं । सरकारी आश्वासन उनके मन में बैठे हुए डर को नहीं निकाल पा रहे हैं। यह हार सिर्फ सूमाखेड़ा व कतोपुरी की , बल्कि एक पूरे समाज की है, उस समाज की जो आधुनिक होने का दंभ तो भरता है परंतु जब आधुनिकता को सर माथे करने की बात आती है तो कुरीतियों के आगे घुटने टेक देता है। सरकार द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान आखिर कौन सी दुनिया में ढोल पीटते हैं क्योंकि देश के कस्बों और गांवों में तो बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान बुरी तरह से फेल होता नजर आ रहा है। आज भी स्कूल से ड्रापआउट लड़कियों का आंकड़ा भयावह है, अकेले फरीदाबाद जिले में 5000 से ज्यादा बच्चे ड्रॉपआउट हैं जिनमे 80% से अधिक लड़कियां हैं। कमोबेश यही हाल कन्या-भ्रूण हत्या का है। हरियाणा समेत लगभग सभी उत्तर-भारतीय राज्यों से अवैध गर्भपात केन्द्रों और झोलाछाप डाक्टरों द्वारा बड़े स्केल पर गर्भपात करने की खबरे हैं। कानून के बावजूद गांव, देहात और छोटे कस्बों, जगह-जगह ऐसे विज्ञापन आम नजर आते हैं कि हमारी मशीनें फट से बता देंगी कि गर्भ में लड़का है या लड़की और हम सब जानते ही हैं कि गर्भ में बिटिया का पता लगने पर उस काम-तमाम करने के इंतजाम भी वहां हैं। यदि हाल यही रहा तो बीस साल बाद हमारे देश में स्थिति ना केवल और चिंताजनक होगी, बल्कि भयावह भी हो सकती है। केन्द्र सरकार ने इस बदनुमा दाग से अधिक आक्रमकता से निबटने का फैसला करते हुए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’  को एक आंदोलन की तरह चलाने का मन बनाते हुए इसे अपने अन्य महत्वाकांक्षी अभियान के तरह चलाने की घोषणा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी को हरियाणा के पानीपत से इस अभियान का शंखनाद किया। अपने विवादों के लिए मशहूर खाप पंचायतों ने भी इस संवेदनशील मसले पर वक्त की नजाकत को समझते हुए कड़े फैसले लिए ताकि हरियाणा के माथे से यह बदनुमा दाग हटाया जा सके। पर हैरत की बात है उसी प्रदेश के कुंठित मानसिकता वाले लोग बेटी को बेटे के बराबर देखना हजम नहीं कर पा रहे हैं।

जनचेतना है जरुरी

भले ही हम सब यह सुनते हुए बड़े हुए हों कि स्त्री देवी हैबेटियां पूजनीय हैं, लेकिन अब भी काफी जगह चाहे महानगर हो या सुदूरवर्ती गांव, सच्चाई कुछ और ही है। बेटियों को पूजने की बात कहने वाले हमारे समाज में आज भी बड़ी संख्या में बेटियां मां के गर्भ में ही मारी जाने लगीं हैं। कितने ही लड़कियां स्कूल जाने को तरसती हैं, स्कूल की इमारत में जाना उनकी हसरत ही रह जाती है।  विज़न न्यूज़ ऑफ़ इंडिया की एडिटर-इन-चीफ शोभना जैन के अनुसार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”  योजना के आलोचकों की भी कोई कमी नहीं है। इन लोगों का कहना है कि इस योजना को सफल बनाने के लिए मामूली रकम के बजाय भारी-भरकम धन का आवंटन किया जाना चाहिए। इसके साथ ही कन्या भ्रूण हत्या करने वालों पर ज्यादा-से-ज्यादा सख्ती बरतने की भी जरूरत है, ताकि अन्य लोगों के मन में भय पैदा हो। जाहिर है, इसके लिए एक कड़ा कानून बनाना होगा। इसी तरह गर्भधारण पूर्व और जन्म पूर्व जांच तकनीकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों पर भी कड़ाई से लगाम कसने की जरूरत है। इसके अलावा स्कूली शि‍क्षा के दौरान ही बालिकाओं के साथ समानता का भाव बालकों के जेहन में पैदा करने की कोशि‍श की जानी चाहिए, तभी आगे चलकर वे उनके साथ भेदभाव करने से बच सकेंगे। यही नहीं, इसका फायदा उनकी नई पीढ़ी को भी मिलेगा।” हालांकि सरकार ने अपनी ओर से लड़कियों की शिक्षा को निशुल्क कर दिया है परंतु लड़कियों को घर से निकाल कर स्कूल तक लाने के लिए भी सरकार को ही आगे आना होगा। क्योंकि दशकों से जारी इस कोढ़ का खात्मा महज सरकारी योजनाएं बना देने नहीं हो सकता, इसके लिए समाज को सरकार के साथ कदम मिलकर चलना होगा। जिस तरह खाप पंचायतों ने आगे बढ़कर कन्या-भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज बुलंद की है वह सराहनीय है परन्तु समाज में अपनी विकृत मानसिकता का जहर घोलने वाले तत्वों पर सख्ती से लगाम लगाना जरुरी है।

डेरा सच्चा सौदा कर रहा है सराहनीय काम

उत्तर भारत में खासा असर रखने वाली सामाजिक संस्था डेरा सच्चा सौदा कई वर्षों से कन्या-भ्रूण हत्या के खिलाफ जोरदार अभियान चलाए हुए है। ग्रामीण अंचलों में लड़कियों के लिए विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान खोलने, सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में चेतना लाने, इकलौती बेटियों को बेटे के समान विवाह के बाद अपने माँ-बाप के साथ रहने का अधिकार देने से लेकर समाज और माँ-बाप द्वारा ठुकराई गई बेटियों को ‘शाही बेटियां बसेरा’ में आसरा देकर उन्हें उत्थान के उचित अवसर देने जैसे कई प्रयास संस्था के द्वारा किए गए हैं जिन्होंने समाज में बेटियों के प्रति मान-सम्मान को बढाने का काम किया है। डेरा द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में पढने वाली बेटियां योग और Inline Roller Skating में विश्वकप जीतकर पूरे विश्व में भारत का नाम ऊँचा कर चुकी हैं। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बाबा राम रहीम के करोड़ों समर्थक हैं जो सत्संगो और फिल्मों के माध्यम से उनसे जुड़े हुए हैं। बाबा राम रहीम की प्रेरणा से उनके समर्थकों ने नारी-सशक्तिकरण की दिशा में ऐसे अनेकों कार्य शुरू किए हैं जो बेटियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करने वाले लोगों के मुंह पर तमाचा हैं। वक्त की नजाकत भी यही है कि जब सरकार बेटी बचाओ बेटी पढाओ अभियान के माध्यम से बेटी के सम्मान को सहेजने की कोशिश कर रही है तो सभी सामाजिक संस्थाओं को भी आगे बढ़कर इस दिशा में कदमताल करनी चाहिए। एक स्थापित मान्यता है कि भारत में सरकारी फरमानों से ज्यादा असरदार सामाजिक और पंचायती संस्थाओं की आवाज रही है, ऐसे में इस सरकारी अभियान को जनचेतना का आन्दोलन बनाया जाना जरुरी है। यदि अभी इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो इसका खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना होगा।

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