हर चार में से 1 बच्चा है डिप्रेशन का शिकार : WHO रिपोर्ट

मनोविशेषज्ञ पायल कक्कड़ के अनुसार मूड-स्विंग होना, उदासी और रोना नैसर्गिक प्रक्रिया है, हम सब जिंदगी में कुछ समय के लिए उदास या परेशान होते हैं, पर डिप्रेशन की स्थिति में रोगी एक लम्बे समय के लिए परिवार और समाज से कट जाता है...

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बच्चों में शारीरिक और मानसिक विकास के दौरान कई तरह की अवस्थाएं आती हैं और इस क्रम में कई बार उनका उदास, परेशान या चिडचिडा होना स्वाभाविक है, परन्तु अगर यह उदासी लम्बे समय तक बनी रहे तो यह अवसाद (Depression) का लक्षण हो सकता है। World Health Organization की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 13 से 15 साल की उम्र का हर 4 में से 1 बच्चा Depression यानि अवसाद का शिकार है।

इसी तरह अन्य आंकड़ो पर यदि गौर करें तो स्वास्थ्य सुविधाओं और फिटनेस के मामले में भारत की स्थिति चिंताजनक है। पूरे विश्व में करीब 1 अरब लोग High Blood Pressure से पीड़ित हैं। भारत में हर 5 में से 1 व्यक्ति High Blood Pressure से पीड़ित हैं। यदि स्थिति यूँ ही रहती है तो 2025 तक High Blood Pressure के मरीजो की संख्या लगभग 21 करोड़ हो जाएगी।

भारत में क्यों बढ़ रहें हैं Depression के मामले

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पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया की बात करें तो 8.6 करोड़ लोग डिप्रेशन की चपेट में हैं। WHO ने बताया कि दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों में से भारत में सबसे ज्यादा आत्महत्या की जाती है। साल 2012 में भारत में 15 से 29 साल के उम्रवर्ग के प्रति 1 लाख व्यक्ति पर आत्महत्या दर 35.5 थी। World Health Organization की दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र की निदेशक पूनम खेत्रपाल सिंह का कहना है कि 15 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों के बीच मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या ही है।

Depression पर केंद्रित World Health Organization की Report बताती है कि 7% किशोर घरेलू हिंसा और पारिवारिक सदस्यों द्वारा डांट-डपट के शिकार पाए गए। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों, शिक्षकों और अन्य लोगों की टिप्पणियों से आहत महसूस किया। रिपोर्ट कहती कि 25% किशोर ‘अवसादग्रस्त और उदास या निराश’ हैं जबकि 11% ज्यादातर समय अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। पारिवारिक झगड़े, अशांति, संबंध-विच्छेद, व आर्थिक परेशानी आदि वजहें भी डिप्रेशन का कारण न सकती हैं

क्या हैं अवसाद के लक्षण – Symptoms Of Depression

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प्रत्येक व्यक्ति समय-समय पर सीमित अवधि के लिए उदासी का अनुभव करता है। लेकिन जब लंबे समय तक लगातार नकारात्मक सोच, दुखी मनोदशा या पसंदीदा गतिविधियों में भी दिलचस्पी न लेने जैसे लक्षण सामने आने लगें तो यह डिप्रेशन हो सकता है।

  • डिप्रेशन के लक्षणों की बात करें तो थकान महसूस होना, सामान्य नींद की प्रक्रिया में विघ्न, नींद न आना व सुबह जल्दी उठ जाना, किसी काम को धीरे-धीरे करना, भूख में कमी अपराध बोध होना, आत्मविश्वास में कमी और सुस्ती शामिल है।
  • असफलता संबंधी विचार, स्वयं को कोसना, शीघ्र निराश होना, असहयोग, निकम्मेपन के विचार, दुर्भाग्यपूर्ण कार्य के लिए स्वयं को जिम्मेदार ठहराना, भविष्य के लिए नकारात्मक व निराशावादी दृष्टिकोण
  • उत्तेजना या शारीरिक व्यग्रता, मादक पदार्थों का सेवन करना, एकाग्रता में कमी और खुदकुशी करने का ख्याल आना भी Depression के लक्षण हैं।

डिप्रेशन का इलाज – Depression Treatment Therapy, Lifestyle & Medication

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मनोविशेषज्ञ पायल कक्कड़ के अनुसार मूड-स्विंग होना, उदासी और रोना नैसर्गिक प्रक्रिया है, हम सब जिंदगी में कुछ समय के लिए उदास या परेशान होते हैं, पर डिप्रेशन की स्थिति में रोगी एक लम्बे समय के लिए परिवार और समाज से कट जाता है। समय रहते अगर डिप्रेशन पर ध्यान न दिया जाए तो रोगी में आत्महत्या के विचार पनप सकते हैं। डिप्रेशन की स्थिति में काउन्सलिंग थेरेपी, लाइफस्टाइल और दवाओं तीनों में संतुलन बनाकर इलाज शुरू किया जाता है।

पायल के अनुसार अवसाद से गुजर रहे लोगों के लिए इससे उबरने के लिए नियमित तौर पर ऐसे व्यक्ति से बात करना जिनपर वे भरोसा करते हों या अपने प्रियजनों के संपर्क में रहना मददगार हो सकता है। अक्सर अकेले रहने के दौरान अवसाद-ग्रस्त व्यक्ति को नेगेटिव ख्याल आते हैं, इसलिए दोस्तों और परिवार के बीच में रहना बेहद जरूरी है।

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डॉक्टर मरीज की काउंसलिंग करके रोग की वजह समझने का प्रयास करते हैं। इसके बाद आवश्यकता के अनुरूप 6-8 माह तक एंटीडिप्रेसेंट दवाएं देते हैं। दवाओं के साथ-साथ मनोचिकित्सा व व्यवहारिक चिकित्सा द्वारा रोगी की निराशाजनक सोच को बदलने का प्रयास किया जाता है। इस दौरान मरीज को पारिवारिक सहयोग जरूरी होता है। परिजनों को यह समझना चाहिए कि डिप्रेशन पागलपन नहीं बल्कि एक सामान्य मानसिक रोग है जिसका उपचार संभव है, बशर्ते वे अपने व्यव्हार को रोगी के प्रति वैसा ही रखें जैसा मनोविशेषज्ञ अपनी मरीज की काउन्सलिंग के दौरान उन्हें सजेस्ट करे।

इसके अलावा डिप्रेशन से उबरने के प्रोसेस में लाइफस्टाइल में परिवर्तन किया जाना अहम होता है। मनोविशेषज्ञ काउन्सलिंग के दौरान मरीज की रोजमर्रा की जिंदगी, खान-पान, वर्किंग स्टाइल, सोने-जागने के टाइम टेबल व अन्य आदतों का गहनता से अध्ययन करते हैं और उसमें कुछ परिवर्तन करने की हिदायत देते हैं। यदि मरीज दवाओं और थेरेपी के साथ-साथ मनोविशेषज्ञ द्वारा लाइफस्टाइल को लेकर सुझाई गई हिदायतों को गंभीरता से फॉलो करता है तो डिप्रेशन का उपचार प्रभावी हो जाता है

खुद से प्यार करना बेहद जरूरी: अवसाद की स्थिति में आप अकसर खुद से प्यार करना भूल जाते हैं। अगर आप खुद से प्यार नहीं करेंगे तो आप इस समस्या से कभी बाहर निकल पाएंगे। यदि आप खुद की देखभाल नहीं करेंगे तो और कोई भी नहीं करेगा।

आज के दौर में जटिल एवं व्यस्त जीवन शैली के कारण लोगों को व्यायाम करने तथा अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने का वक्त नहीं है जिसकी वजह से शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। यदि आप खुद से प्यार करते हैं तो उठिए और आज से ही खुद पर ध्यान देना शुरू करें, अपने पसंदीदा कपड़े पहनें, म्यूजिक, पेंटिंग या जिस भी चीज से आपको ख़ुशी मिलती है वो काम करें, चेहरे पर कॉन्फिडेंस का भाव लाएं और देखिए कैसे डिप्रेशन आपकी जिंदगी से हवा हो जाता है।

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