भारत के सच्चे संत – भारतीय संस्कृति के पुरोधा महापुरुषों का जीवन परिचय

विश्व की कई महान सभ्यताएँ समय के गर्क में खो गई, पर संत-महात्माओं ने अपने पराक्रम और बलिदान से भारतीय सभ्यता को सींचते हुए इसे जिन्दा रखा..

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सभ्यता के प्रारंभ से ही मानवीय मूल्यों, प्रेम, सहिष्णुता, त्याग और सद्व्यवहार के मूल्यों का संचार करने वाले साधु-संन्यासी, संत और फकीर-औलिया भारत-भूमि पर अवतरित होते रहे हैं, जिन्होंने अपना सर्वस्व त्याग कर सारा जीवन मानवता के कल्याण के लिए लगा दिया। यहाँ की मिट्टी में उन महान वीरों और संतो के पदचिह्न भी मिलते हैं जिन्होंने धर्म और सच्चाई की राह पर चलते हुए भारतीय सभ्यता को फर्श से अर्श की ऊंचाई दी और अपने जिस्म का कतरा कतरा इस मिट्टी में मिलाके इसे पूजने योग्य बना दिया।

“जर्रा जर्रा यहाँ का किसी के त्याग की गवाही है,
मिट्टी में मिली किसी के खून की स्याही है
यू हीं नहीं ये देश विश्वगुरु कहलाता,
यहाँ पर अवतरित होती रब की परछाई है!”

भारत की आज़ादी को किसी ना किसी खतरे ने घेरे रखा है; कभी विदेशियों का हमला तो कभी अधर्म का राज। भारतीय सभ्यता का प्रसार जिस तेजी से हुआ और जिस तरह अकूत धन-संपदा और वैभव से परिपूर्ण हमारा इतिहास रहा है उसी गति से विदेशी आक्रांताओं ने भारत को लूटने और यहाँ की महान परम्पराओं को छिन्न-भिन्न करने के प्रयास किए हैं।

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विश्व की कई महान सभ्यताएँ समय के गर्क में खो गई, पर संत-महात्माओं ने अपने पराक्रम और बलिदान से भारतीय सभ्यता को सींचते हुए इसे जिन्दा रखा। हमारे वीर जवानों की बहादुरी ने जहां देश धरती को विदेशी आक्रांताओं से महफूज रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी वहीं हमारे महान संतो ने अधर्म का खात्मा कर धर्म की स्थापना की और यह सिलसिला अभी भी जारी है।

रूहानियत और सामाजिक पृष्ठभूमि में संतों का महत्त्व

घोर कष्‍टों, संकटों, अभावों और अपमानों को सहकर विश्व-कल्याण के लिए सब कुछ अर्पित कर देने, मानव को धर्म और अधर्म का अंतर समझाने और उन्हें सद्मार्ग दिखाने का महाकर्म है— संतों का जीवन।  संतों का धरा पर आगमन कुछ बहार के आने के जैसा ही है। उनके पाक पवित्र चरण धरती पर लगते ही कुल आलम में एक नयापन, ताजगी सी आ जाती है और रूहानियत का एक नया दौर चल पड़ता है।

बुल्ले शाह, संत रविदास, कबीर जी, गुरु नानक देव, शाह मस्ताना, संत तुलसीदास, मीराबाई आदि अनेक पात्शाहियों ने मानवता को सही अर्थ दिया,इंसान को इंसानियत से रूबरू कराया। आइये जानते हैं कुछ ऐसी ही हस्तियों के बारे में:

बाबा बुल्ले शाह जी का जीवन परिचय – Biography Of Baba Bulleh Shah

संत बुल्ले शाह एक पंजाबी मुस्लिम थे जिनका वास्तविक नाम सैयद अब्दुल्लाह शाह कादरी था। शाह इनायत कादरी जी के शिष्य के रूप में उन्होंने रूहानियत का ज्ञान प्राप्त किया। बुल्ले शाह का जन्म 1680 ईस्वी में उच्च गिलानिया (पहले पंजाब में था, अब पाकिस्तान में) में हुआ।

बुल्ले शाह के पिता सैय्यद जाति से ताल्लुक रखते थे और इस जाति को मुसलमानों में सबसे ऊँची जाति माना जाता था, बुल्लेशाह के पिता मस्जिदों में स्कूली और मजहबी तालीम देते थे। परिवार के धर्म-कर्म से जुड़े होने के कारण छोटी उम्र में ही बुल्लेशाह के मन में रूहानियत के प्रति जिज्ञासा जाग गई और वो सारंगी लेकर अल्लाह की बंदगी करने लगे।

कहते हैं कि उर्दू, फारसी के धर्म-ग्रंथो और विद्वानों की तालीम पढ़ते हुए बुल्लेशाह ने छोटी उम्र में ही इतनी साधना कर ली कि वे अधपके फल को पेड़ से गिरा देते थे। पर इन रिद्धि-सिद्धि और रूहानी इल्मों का ज्ञान उनकी जिज्ञासा को शांत न कर सका, बुल्लेशाह को तलाश थी एक ऐसे मुर्शिद की जो खुदा से मिलवा सके।

बुल्लेशाह की यह तलाश शाह इनायत पर जाकर रुकी। एक दिन वह शाह इनायत के बागों के पास से गुजर रहे थे उन्होंने स्वभाववश उनके पेड़ों से आम गिरा दिए, जब शाह इनायत की नजर उन पर पड़ी तो उनके नूरी दीदार के एक झलक पाते ही Bulle Shah उनके चरणों में नतमस्तक हो गया और झोली फैला के गुजारिश की – मुझे खुदा से मिला दो। इस पर शाह इनायत ने कहा – खुद को भुला दो, बस फिर क्या था बुल्लेशाह उसी दिन से उनका मुरीद हो गया।

इक बुल्ला ऐसा नाचा, झूम उठी खुदाई, आँखों से झर झर नीर बहे, प्रेम की बाढ़ सी आई!

बुल्ले शाह के मुर्शिद (गुरु) शाह इनायत एक नीची जाति ‘अराई’ से सम्बन्ध रखते थे। इसलिए वो लोग जो सैयद थे उन्होंने बुल्ले शाह की भक्ति का विरोध किया परंतु बुल्ले शाह ने हर मुश्किल और विरोध से ऊपर उठकर अपने मुर्शिद की भक्ति की।

बुल्ले नू समझावण आइयां भैणां ते भरजाइयां
बुल्ले तूं की लीकां लाइयां छड्ड दे पल्ला अराइयां

कंजरी (नाचने वाली) बनकर अपने मुर्शिद को रिझाया: कहते हैं एक बार शाह इनायत बुल्ले शाह से किसी बात पर नराज़ हो गये तो बुल्ले शाह ने एक कंजरी का रूप धरकर अपने मुर्शिद को अपने नृत्य से मनाया वो दृश्य तो देखने वाला था।

कंजरी बनेया मेरी इज्जत घटदी नाहीं मैंनू नच के यार मनावण दे

बुल्ला ने अलाह को पाने को जो रास्ता अपनाया वो इश्क मज़ाजी (इंसान से मोहब्बत) से होते हुए इश्क हकीकी (खुदा से मोहब्बत) को जाता है। बुल्ले ने एक (मुर्शिद) से इश्क किया और उस एक (खुदा) को पा लिया। बुल्ला कहता है –

राझां राझां करदी नी मैं आपे रांझा होई
सद्दो नी मैंनू धीदो रांझा हीर ना आखो कोई

संत बुल्ले शाह ने अपनी काफियों (रचनाओं) के द्वारा उस समय प्रचलित बुराइयों का विरोध किया। अपनी रचनाओं के द्वारा उन्होंने मानवतावाद को बढ़ावा दिया। उनके समय में औरंगजेब ने गायन और वादन पर रोक लगा दी परन्तु अपने मुर्शिद के आदेशानुसार ने बुल्ले शाह ने पंजाब के हर गाँव में जाकर समाजिक घृणा और नफरत का अपने गायन के द्वारा विरोध किया। बुल्ले शाह ने मज़हब, शरीयत और जेहाद के असल मायने समझाए। इसके साथ साथ उन्होंने लोगों को अर्थहीन रीतियों और अन्धविश्वास से ऊपर उठकर भक्ति करने की प्रेरणा दी। उन्होंने हिन्दुओं और मुस्लिम दोनों में ही भगवान को देखा।

बुल्लेशाह का साहित्य: बुल्लेशाह ने पंजाबी सूफी साहित्य को नया आयाम देते हुए 62 काफीयां, एक अठवारा, एक बारहमाहा, तीन शीहहर्फीयां, 49 दोहे और 40 गांठे लिखी। बुल्ले शाह की काफियों को कई रचनाकारों ने संग्रहित कर पुनः प्रकाशित किया। नुसरत फतेह अली खान, राहत फतेह अली खान, Sain Zahoor, हंस राज हंस, गुरदास मान, रब्बी शेरगिल जैसे कई नामी गायकों ने उनके कलमों को गाया और आज भी कई कलाकार बुल्लेशाह के संगीत को कामयाबी की कड़ी मानते हैं। उनकी काफियां सूफी संतो के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। बुल्ले शाह की रचनाओं में समावेशित जुदाई का दर्द हर आँख में आंसू ला देता है और वहीं समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करता है।

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बुल्ला ने अलाह को पाने को जो रास्ता अपनाया वो इश्क मिज़ाजी (इंसान से मोहब्बत) से होते हुए इश्क हकीकी (खुदा से मोहब्बत) को जाता है। बुल्ले ने एक (मुरशद) से इश्क किया और उस एक (खुदा) को पा लिया। बुल्ला कहता है,

राझां राझां करदी नी मैं आपे रांझा होई
सद्दो नी मैंनू धीदो रांझा हीर ना आखो कोई

इश्क-ए-हकीकी के तराने गाते हुए बुल्लेशाह सन 1757 में खुदा से जा मिले, पर अपनी काफियों और समझाइशों में वो आज भी जिन्दा हैं। बुल्लेशाह की गीतों को गुनगुनाते हुए हम आज भी उनकी रूह को अपने आसपास पाते हैं।

गुरु नानक देव जी की जीवनी – Biography Of Guru Nanak Dev Ji

गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1469 (कार्तिक मास की पूर्णिमा) को तलवंडी में हुआ। तलवंडी का नाम आगे चलकर ननकाना साहिब पड़ा जोकि अब पाकिस्तान में है। पिता बाबा कालुचन्द्र बेदी और माता त्रिपता के आँखों के तारे नानक जी का सम्पूर्ण जीवन प्रेरणादायी है। पिता से व्यापार के लिए मिले रुपयों को गरीबों में बाँट देना, जात पात से ऊपर उठकर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देना, अन्धविश्वास का कड़ा विरोध करना आदि उनकी उदारता और मानवता के प्रति समर्पण की दास्तान है।

गुरु नानक देव जी का प्रारंभिक जीवन: जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ पूरा घर एक अलौकिक प्रकाश से जगमगा उठा। बाल नानक के मुख पर असीम शांति के भाव थे और अत्यंत आभामय था।

जीती नौखंड मेदनी सतिनाम दा चक्र चलाया,
भया आनंद जगत बिच कल तारण गुरू नानक आया

गाँव के पंडित हरदयाल ने जब बाल नानक के इस अनोखे स्वरूप के बारे में सुना तो वे उनके दर्शन करने के लिए घर आए, बाबा नानक के नूरी स्वरूप को देखकर उन्हें यह समझने में देर न लगी कि यह जरुर कोई ईश्वरीय शक्ति है।

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जब नानक थोड़े बड़े हुए तो पिता कालुचंद ने उन्हे पढने के लिए पंडित जी के पास भेजा। पंडित हरदयाल जी ने नानक को पढ़ाना शुरू किया तो बालक ने उनसे अक्षरों का अर्थ पूछा। पंडित जी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। इस पर नानकजी ने क से लेकर ड़ तक का सारा कवर्ग काव्यबद्ध रचना में सुना दिया। पंडितजी आश्चर्यचकित होकर नानक की तरफ देखने लगे, उन्हें यह अहसास हो गया कि नानक को स्वयं ईश्वर ने पढ़ाकर संसार में भेजा है।

इसके उपरांत नानक को मौलवी कुतुबुद्दीन के पास पढ़ने के लिए बिठाया गया। नानक के प्रश्न से मौलवी भी निरुत्तर हो गए तो उन्होंने अलफ, बे की सीफहीं के अर्थ सुना दिए। इस तरह दुनियावी तालीम की दीवारें बाल नानक को बाँधकर न रख सकीं। पंडित-मुल्ला का दिया ज्ञान उन्हें निरर्थक और नीरस लगा और वे ईश्वर की भक्ति में लीन हो गए।

गुरु नानक देव जी का रूहानी सफरनामा: 1507 ई. में 1515 ई. तक बाबा नानकदेव जी ने अपनी पहली ‘उदासी’ (जीवोद्धार यात्रा) के दौरान हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग, काशी, गया, पटना, असम, सरसा, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वर, सोमनाथ, द्वारिका, नर्मदातट, बीकानेर, पुष्कर, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, मुल्तान, लाहौर आदि स्थानों पर भ्रमण करते हुए अनेकों लोगों का हृदय परिवर्तन किया और नाम-शब्द की बख्शीश की।

इस रूहानी यात्रा के दौरान उन्होंने अनेक ठगों को साधु बनाया, पतितों का उद्धार किया, वेश्याओं का अन्त:करण शुद्ध कर नाम का दान दिया, कर्मकाण्डियों को बाह्याडम्बरों से निकालकर एक-ओंकार की भक्ति में लगाया, अहंकारियों का अहंकार दूर कर उन्हें मानवता का सबक पढ़ाया। यात्रा से लौटकर वे दो वर्ष तक अपने माता-पिता के साथ रहे।

उनकी दूसरी ‘उदासी’ 1517 ई. से 1518 ई. के दौरान उन्होंने ऐमनाबाद, सियालकोट, सुमेर पर्वत आदि की यात्रा की और अन्त में वे करतारपुर पहुँचे। अपनी तीसरी ‘उदासी’ 1518 ई. से 1521 ई. में उन्होंने रियासत बहावलपुर, साधुबेला (सिन्धु), मक्का, मदीना, बग़दाद, बल्ख बुखारा, क़ाबुल, कन्धार, ऐमानाबाद आदि स्थानों की यात्रा की। इसके बाद वे करतारपुर में बस गये और 1521 ई. से 1539 ई. तक वहीं रहे।

महान दार्शनिक और समाज-सुधारक थे गुरु नानक देव जी: जब गुरु नानक देव जी अपनी रूहानी जीवोद्धार यात्रा पर निकले तब चारों तरफ अन्धविश्वास, आडंबरों का बोलबाला था और धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ रही थी। गुरु नानकदेव जी इन सबके विरोधी थे। उन्होंने जीवों को बाहरी आडम्बरों से बाहर निकल कर और मूर्तिपूजा छोड़कर एक ईश्वर की उपासना करने की सीख दी।

गुरु नानक देव जी न सिर्फ एक आध्यात्मिक गुरु थे बल्कि उन्होंने अपने जीवन में दार्शनिक, संत, ग्रहस्थी, त्यागी-तपस्वी, धर्म-प्रचारक, समाज-सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त सभी किरदार निभाते हुए भारतवर्ष और अन्य देशों में प्रेम, त्याग व मानवीयता के मूल्यों का संचार किया। लोगों पर उनके विचारों का असाधारण प्रभाव पड़ा।

श्री गुरु नानक देव जी ने हिन्दू और मुसलमानों के सिद्धांतो को मिलाकर सिख धर्म की स्थापना की और सिख धर्म के प्रथम पातशाह के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने जगह जगह घूमकर इन सिद्धांतो का प्रचार भी किया। मर्दाना के रबाब और नानक देव जी का संगीत श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर देता था और उनके हृदय पर अत्यंत प्रभाव डालता था।

नानक के साज पर रूहानियत चडी परवान,
हिन्दुओं के गुरु बने,पीर पुकारे मुसलमान

श्री गुरु नानक देव जी के 10 सिद्धांत – 10 Cardinal Rules of Guru Nanak Dev Ji

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जैसा कि पहले भी जिक्र में आया, आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ बाबा नानक देव जी एक महान दार्शनिक और समाज-सुधारक भी थे। उन्होंने जपुजी साहब की पहली पौड़ी (छंद) में अपने अनुयायियों को गृहस्थ और त्यागी जीवन में तारतम्य बिठाने के लिए ऐसे सिद्धांत दिए जो आज भी प्रासंगिक हैं।

यदि आप इन सिद्धांतों को Broadminded Vision के साथ गहराई से समझने की कोशिश करेंगे तो आप पाएँगे कि विश्व आज जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उन सभी का समाधान इन सरल से नियमों में समाहित है, यदि सभी गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं पर अमल करें तो विश्व शांति की ओर बढ़ सकता है।

जपुजी साहब की पहली पौड़ी का पंजाबी-हिंदी-English अनुवाद 

ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
एक ओंकार सत नाम करता पुरख निरभऊ निरवैर अकाल मूरत अजूनी सैभं गुर प्रसाद ॥

Ik­oaʼnkār saṯ nām karṯā purakẖ nirbẖa­o nirvair akāl mūraṯ ajūnī saibẖaʼn gur parsāḏ.
ਆਦਿ ਸਚੁ ਜੁਗਾਦਿ ਸਚੁ ॥ ਹੈ ਭੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਹੋਸੀ ਭੀ ਸਚੁ ॥
आदि सचु जुगादि सचु ॥ है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥
aadh sach jugaadh sach ॥ hai bhee sach naanak hosee bhee sach

Meaning Of Ek Onkar Shabad:

  • एक ओंकार (ੴ, Ek Onkar): ईश्वर एक है – God is One
  • सत नाम (ਸਤਿ ਨਾਮੁ , Sat Nam): अकाल पुरख का नाम सबसे सच्चा है – True is His Name
  • करता पुरख (ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ , Karta Purakh): वो ही सब कुछ बनाने वाला है और वो ही सब कुछ करने वाला है – He is the Creator
  • निरभऊ (ਨਿਰਭਉ , Nirbhau): वह सर्वशक्तिमान ईश्वर निर्भय है – He is devoid of any fear
  • निरवैर (ਨਿਰਵੈਰੁ , Nir Vair): काल पुरख का कोई शत्रु नहीं है, वह सभी से प्रेम करता है – God is devoid of any enmity, he hates none.
  • अकाल मूरत (ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ, Akaal Moorat): वह सर्वव्यापक, सर्वकालिक, काल (समय) की हदों से बाहर है – He is omnipresent, He is beyond the time, yet He is everywhere.
  • अजूनी सैभं (ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ , Ajooni Saibhang): वो जूनी (योनियों) में नहीं पड़ता। वो ना तो पैदा होता है ना मरता है। उसको किसी ने न तो जनम दिया है, न बनाया है वो खुद प्रकाश हुआ है – He is free from the cycles of birth, He exists on His own.
  • गुर परसाद (ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ, Gur Parsaad): केवल पूर्ण गुरु की कृपा से ही इंसान को अकाल पुरख की समझ हो सकती है

सन् 1539 ई. में बाबा नानकदेव जी ने गुरुगद्दी का भार गुरु अंगददेव (बाबा लहना) को सौंप दिया और स्वयं करतारपुर में ‘ज्योति-ज्योत’ समा गए। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और नफरत के इस दौर में प्रेम और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाती हैं। उनकी रचना ‘जपुजी साहिब’ का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए श्री मद भागवत गीता का है। दुःख की बात यह है कि उन्हें पढने वाले तो आज भी बहुत हैं परन्तु उनके विचारों का सही अनुवाद करके उसे समझाने वाले बहुत कम बचे हैं।

संत रविदास जी का जीवन परिचय – Biography Of Sant Ravidas

15वीं शताब्दी में जन्मे संत रविदास (संत रैदास) जी ने समाज को खोखला कर रही अस्पृश्यता के दीमक को जड़ से मिटाने का साहस किया। वे चर्मकार (चमार, चमड़ा बनाने वाले) जाति से संबंध रखते थे। चर्मकार जाति को उस समय दोयम दर्जे का माना जाता था, इस कारण उन्हें अपने सामाजिक जीवन और भक्ति-मार्ग में अत्यंत कष्टों का सामना किया।

गाँव के सरपंच के पुत्र होने के बावजूद शिक्षा और भक्ति करने से भी इन्हें रोका गया। परन्तु अपने तर्क और ज्ञान के बलबूते उन्होंने समाज में फैले छुआछूत और जातिवाद को ऐसा जवाब दिया जो वर्तमान में भी प्रासंगिक है।
इनके विचारों, काव्य और संगीत का लोहा बाबर जैसे आततायी सम्राट ने भी माना।

संत रविदास जी का आरंभिक जीवन: संत रविदास जी के जन्म के बारे में कई इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं, परन्तु अधिकतर इतिहासविदों के अनुसार उनका जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वाराणसी) में संतो़ख दास (रग्घु) और कलसा देवी के घर में हुआ। यद्यपि बाल्यकाल से ही वे साधू-संतो की संगति में रहते हुए प्रगाढ़ ज्ञान को आत्मसात कर चुके थे फिर भी जूते बनाने का काम जोकि उनका पैतृक व्यवसाय था उसे सहर्ष अपनाया।

उनके पिता अपने नगर के सरपंच थे। जब रविदास पढ़ने के लिए पंडित शारदा नंद की पाठशाला में गए तो उच्च जाति के लोगों ने पंडित जी को उन्हें पढ़ाने से रोका, परन्तु रविदास की असाधारण प्रतिभा को परखते हुए पंडित शारदा नंद ने उनका गुरु बनना स्वीकार किया।

संत रविदास जी का सामाजिक जीवन: परोपकार और दया संत गुरु रविदास जी के स्वभाव का प्रमुख अंग थे और वे अपना अधिकतर समय दूसरों की मदद करने और साधु- संतो की संगति में व्यतीत करते थे। अक्सर वे उन्हें अपने बनाए हुए जूते बिना कोई दाम लिए भेंट कर दिया करते थे।

उन्होंने अपने आजीविका के साधन को भी साधु-सेवा का माध्यम बना लिया था, उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे और उन्होंने रविदास और उनकी पत्नी को घर से अलग कर दिया। इसके बाद घर के पास ही छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगे, जूते बनाने से जो पैसे आते उन्हें समाजसेवा में लगा देते और जो बचता उसमें अपना गुजारा करते।

मीराबाई के गुरु थे संत रविदास: बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि मीराबाई ने अपनी रचनाओं में संत रविदास जी को अपना आध्यात्मिक गुरु माना है। मीरा बाई के दादा रैदास के अनुयायी थे, मीराबाई संत रविदास को अपना गुरु मानते हुए कहती हैं-

गुरु मिलिया रैदास दीन्ही ज्ञान की गुटकी

संत रविदास जी की रचनाएँ -Sant Ravidas Ke Dohe

संत रविदास जी की वाणी और दोहे इतने प्रासंगिक हैं कि आज भी उनकी रचनाओं पर भजन बनाए जाते हैं।

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जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा। 
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

Sant Ravidas Jayanti: हर वर्ष देशभर में माघ महीने के पूर्णिमा के दिन गुरु रविदास जयंती धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन संत रविदास की वाणी और भजनों का पाठ किया जाता है और उनके विचारों का स्मरण करते हुए भेदभाव-रहित समाज के निर्माण का प्रण लिया जाता है।

“एक व्यापारी ऐसा आया,कर गया समाज का उद्धार,
पाई पाई भक्ति की बांटी, अज़ब था उसका व्यापार”

संत कबीर जी का जीवन परिचय – Biography Of Saint Kabir Ji

संत कबीर दास जी का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। ज्ञानाश्रयी-निर्गुण विचारधारा के पुरोधा माने जाने वाले संत कबीर जी एक महान कवि और समाज-सुधारक थे जिन्होंने भक्ति-आन्दोलन को एक नया आयाम दिया। संत कबीर ने बिना किसी लाग-लपेट के निडरता से बेहद सरल भाषा में अपने तर्क से समाज में फैली कुरीतियों पर प्रहार किया और इसी वजह से साहित्य जगत में उनका नाम बड़े ही अदब से लिया जाता है।

संत कबीर दास जी का आरंभिक जीवन: संत कबीर दास का जन्म सन् 1398 में काशी में हुआ। कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- अपनी अवस्था के युवकों से एकदम भिन्न रहते थे। कबीर ने ग्रन्थ अपने हाथ से खुद नहीं लिखे, उन्होंने वचन उचारे और उनके शिष्यों ने लिपिबद्ध किए।

जीविकोपार्जन के लिए कबीर जुलाहे का काम करते थे। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं। संत रामानंद जी को अपना गुरु धारण करने के लिये इन्होंने जाति पाति के भेदभाव का डटकर सामना किया। एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े। रामानन्द जी गंगा स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल ‘राम-राम’ शब्द निकल पड़ा। उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में-

हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये

संत कबीर की रचनाएँ – Sant Kabir Ke Dohe

संत कबीर की भाषा शैली: उनके दोहे उनकी मानवता के प्रति समपर्ण और बुराइयों के विरोध की कहानी ब्यान करते हैं। कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओं के शब्द मिलते हैं यथा – अरबी, फ़ारसी, पंजाबी, बुन्देलखंडी, ब्रजभाषा, खड़ीबोली आदि के शब्द मिलते हैं इसलिए इनकी भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा जाता है।

श्री गुरु ग्रंथ साहब जी में उनके 100 पद और 140 साखियां हैं। कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ के नाम से प्रसिद्ध है। कबीरदास की वाणियों के अनेक संग्रह प्रकाशित हुए है, पर उनमें सबसे अच्छा सुसंपादित संस्करण अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की ‘कबीर’ रचनावली है। उनके दोहे आज भी समाज को सही राह दिखाते हैं।

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जुलाहा परिवार से सम्बन्ध रखने वाले कबीरदास जी कर्मप्रधानता मत में विश्वास रखते थे। कबीर ने हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया।

पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार ।
वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार ।।

Sant Kabir Das Ji ने भी समाज का विरोध सहा। यहाँ तक कि उनका खुद का पुत्र कमाल उनके मत का विरोधी था। उनकी पत्नी लोई और पुत्री कमाली उनकी शिष्या बने। संत रामानंद के पांव के प्रहार को उनका आशीर्वाद और उनके मुख से निकले राम शब्द को नाम दीक्षा समझा।

हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के गुरु थे कबीर: कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने।

मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है। जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1448 को मानते हैं। आज भी वहां स्थित मजार व समाधी स्थित है।

संत तुलसीदास का जीवन परिचय – Biography Of Sant Tulsi Das Ji

गोस्वामी तुलसीदास जी रामभक्त के रूप में विश्व प्रसिद्ध हैं और उन्होंने ही वास्तविक रामायण की संस्कृत भाषा में रचना की।तुलसीदास जी को महर्षि बाल्मीकि जी का पुनः अवतार भी माना जाता है। कहानीकारों के अनुसार, तुलसीदास जी 12 माह तक अपनी माता हुलसी जी के गर्भ में रहे।

इनका विवाह रत्नावली जी से हुआ जो आगे चलकर इनकी भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण का कारण बनी। एक बार अपनी पत्नी को अपने घर में ना पाकर, तुलसीदास जी एक मुर्दे के शरीर पर बैठकर यमुना पार कर गये और एक सर्प से लटककर अपनी पत्नी के कक्ष तक पहुंच गये। उस समय इनकी पत्नी ने इन्हें भगवान से प्रेम करने की प्रेरणा दी। अत: इन्होंने घर त्याग दिया और प्रभु भक्ति में लग गये।

अपने इष्ट के दर्शन के लिए ये चित्रकूट पर्वत पर ही रहने लगे। वहीं पर श्रीराम जी ने इन्हें दर्शन दिये और इनका तिलक भी किया। तुलसीदास जी एक महान संत, समाज सुधारक और दार्शनिक थे। इनके दोहे समाज की कुरीतियों पर कटाक्ष करते हैं। इनकी रचनाओं में हनुमान चालीसा, कवितावली, दोहावली, गीतावली आदि बहुत प्रसिद्द हैं। 126 वर्ष की आयु में तुलसीदास जी ने गंगा तट पर शरीर त्याग दिया।

भक्त मीराबाई का जीवन परिचय – Biography Of Mirabai

भक्ति की अदभुत मिसाल मीराबाई को आज भी श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है। उनका सम्पूर्ण जीवन ही एक शिक्षादायी स्त्रोत है।बाल्यकाल में पिता द्वारा दी गयी श्रीकृष्ण की एक मूर्ति को मीराबाई ने अपना सम्पूर्ण जीवन बना लिया।

मीराबाई का जन्म 16वीं शताब्दी में राजस्थान में हुआ। इनकी माता ने एक बार मीराबाई के द्वारा अपने विवाह के बारे में पूछे गये प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण को उनका पति बताया। उस दिन से मीराबाई ने श्रीकृष्ण को ही अपना संसार बना लिया।

इनके पिताजी ने इनका विवाह चित्तोड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज से करवा दिया। शादी की हर रस्म को दिल से निभाते हुए भी मीराबाई ने श्रीकृष्ण की भक्ति को नहीं छोड़ा। पति के देहांत के बाद मीराबाई ने सती होने से भी इन्कार कर दिया। उनका मानना था की उनके पति श्रीकृष्ण अभी जीवित हैं।

राणा सांगा ने मीराबाई पर बहुत अत्याचार किया। उन्हें जहर का प्याला भी पिलाया। पर श्रीकृष्ण ने हर बार अपने भक्त की रक्षा की। मीराबाई अपने भजनों से सबको मंत्रमुग्ध कर देती थी। उनके भजनों में श्रीकृष्ण के प्रति उनके निश्छल प्रेम की झलक मिलती है। कहा जाता है कि वृन्दावन में भक्ति करते हुए मीराबाई श्रीकृष्ण की प्रतिमा के हृदय में समा गयी।

महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय – Biography Of Mahatma Buddha

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ था, सिद्धार्थ अर्थात् सिद्धि प्राप्त करने वाला। उनका जन्म पाटलिपुत्र के राजा शुद्धोधन के यहाँ हुआ। सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया। इनका पालन पोषण राजा शुद्दोधन की दूसरी पत्नी ने किया।

सिद्धार्थ बाल्यकाल से ही अत्यंत दयावान थे। जब उनके सौतेले भाई ने एक पक्षी को बाण मारकर घायल कर दिया तो उनकी आँखों से अश्रु बह गये। इनका विवाह यशोधरा से हुआ और इन्हें राहुल नाम का एक पुत्र हुआ। विवाह के एक वर्ष के पश्चात् ही इन्होंने घर त्याग दिया और सत्य और ज्ञान की खोज में निकल गये।

वैशाखी पूर्णिमा के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और आज वह वृक्ष बौद्ध वृक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। महात्मा बुद्ध ने पाली भाषा जो उस समय जनसाधारण की भाषा थी, में बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार किया। उनकी सोच अदभुत थी और दुनिया का सत्य उजागर करती थी।

महावीर स्वामी का जीवन परिचय – Biography Of Mahavir Swami

अदभुत कौशल के स्वामी और जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का वास्तविक नाम वर्धमान था। इनका जन्म आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व राजा सिद्दार्थ और माता त्रिशला के यहाँ हुआ। बचपन में राजकुमार की तरह जीवन व्यतीत करने वाले वर्धमान बाद में त्याग और समर्पण की अनोखी मिसाल बने। इन्हें वीर तथा सन्मति कहकर भी पुकारा जाता था।

वैशाली के लोग (वर्तमान बसाड गाँव, मुज्ज़फरपुर) इन्हें सज्जंस और जसस(यशस्वी) कहकर पुकारते थे। इनके माता पिता जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पाशर्वनाथ जी की आराधना करते थे। महावीर जी जब 28 वर्ष के थे तब इनके माता पिता का देहांत हो गया। उनके निधन के 2 वर्ष पश्चात् इन्होंने घर त्याग दिया और 30 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त किया।  उसके बाद ये आराधना में ही लीन रहने लगे।

12 वर्षों तक और कड़ी तपस्या कर इन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त किया। इन्होंने अपने वस्त्रों का पूर्णतया परित्याग कर दिया और अपना सम्पूर्ण जीवन सम्माज को सौंप दिया। इन्होंने समाज में उस समय प्रचलित कुरीतियों सती प्रथा,जाति-पाति, पशु बलि, हिंसा आदि का कड़ा विरोध किया। त्याग, प्रेम, सत्य और अहिंसा हमेशा ही इनके वचनों का सार रहे। 72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी जी ने निर्वाण प्राप्त किया।

एक सच्चे संत के रूप में भगवान हमेशा ही धरत पर आते रहे हैं और लोगों को इंसानियत का पाठ समझाते रहे हैं।भारतवर्ष की भूमि खुद ही इन महान संतो की गाथा ब्यान करती है। आओ मिलकर दिल से शुक्र और शत शत नमन करें उन महान संतों का जिनकी वजह से हम ज़िन्दगी जीने का अर्थ और उद्देश्य समझे हैं।

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